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डिजिटल अरेस्ट स्कैम: नकली CBI, पुलिस और बैंक कॉल से कैसे बचें

StoryCheck टीम · 7 मिनट पढ़ें · प्रकाशित 6 अगस्त 2026

यह इस समय भारत का सबसे गंभीर फ़्रॉड है, और यह इसलिए काम करता है क्योंकि यह पैसे से पहले डर पर हमला करता है। सबसे पहले वह बात जान लीजिए जो सब कुछ तय कर देती है: भारतीय क़ानून में "डिजिटल अरेस्ट" जैसी कोई चीज़ है ही नहीं। कोई भी पुलिस, CBI, ED, कस्टम या TRAI अधिकारी किसी को वीडियो कॉल पर गिरफ़्तार नहीं करता, न ही किसी को घर में कैमरे के सामने बैठे रहने का आदेश देता है, और न ही किसी "वेरिफिकेशन खाते" में पैसे भेजने को कहता है। अगर कोई कॉल पर ऐसा कर रहा है तो वह चाहे कितना भी असली लगे, वह ठग है। कॉल काट दीजिए। जो नंबर संदिग्ध लगे उसे निजी तौर पर जांचा जा सकता है, और उस जांच की खबर कॉलर तक नहीं पहुंचती।

जल्दबाज़ी, असामान्य भुगतान और नंबर के मेल न खाने जैसे ठगी के संकेत दिखाता चित्र
हर तरीक़ा एक ही चीज़ पर टिका है: आपको पुष्टि करने का मौक़ा न मिले।

यह फ़्रॉड कैसे चलता है

शुरुआत आमतौर पर एक कॉल या रिकॉर्डेड मैसेज से होती है: आपके नाम से भेजे गए पार्सल में ड्रग्स या नकली पासपोर्ट मिले हैं, आपका आधार किसी मनी लॉन्ड्रिंग खाते से जुड़ा है, या आपका मोबाइल नंबर किसी अपराध में इस्तेमाल हुआ है और अब बंद होने वाला है। फिर कॉल किसी "साइबर क्राइम ब्रांच" को ट्रांसफ़र होती है और वीडियो कॉल शुरू हो जाती है, जिसमें वर्दी, पीछे थाने जैसा सेट, नकली आईडी कार्ड और आपके नाम का नकली गिरफ़्तारी वारंट दिखाया जाता है। वहां से घंटों की मानसिक घेराबंदी शुरू होती है: कैमरा बंद मत कीजिए, किसी से बात मत कीजिए, यह गोपनीय जांच है। अंत में "जांच पूरी होने तक" पैसे किसी खाते में ट्रांसफ़र करने को कहा जाता है, यह भरोसा देकर कि जांच के बाद पैसे लौटा दिए जाएंगे।

अगर आप या आपके घर में कोई अभी इस स्थिति में है: कॉल तुरंत काट दीजिए, वीडियो बंद कर दीजिए, और घर के किसी सदस्य या दोस्त को अभी बताइए। ठगों की पूरी ताक़त इसी में है कि आप अकेले रहें और किसी से बात न करें। कोई पैसा मत भेजिए। इसके बाद 1930 पर कॉल कीजिए।

पहचान के पक्के संकेत

  • "डिजिटल अरेस्ट", "डिजिटल हिरासत" या "वर्चुअल कस्टडी" शब्द का इस्तेमाल। यह क़ानून में मौजूद ही नहीं है।
  • वीडियो कॉल पर गिरफ़्तारी, पूछताछ या बयान दर्ज करने का दावा। असली जांच लिखित नोटिस और थाने में होती है।
  • गोपनीयता की सख़्त शर्त: परिवार, वकील या बैंक से बात करने की मनाही।
  • "वेरिफिकेशन", "सिक्योरिटी डिपॉज़िट" या "जांच शुल्क" के नाम पर पैसे किसी निजी खाते या UPI आईडी में मांगे जाना।
  • आधार, PAN, बैंक बैलेंस और OTP जैसी जानकारी कॉल पर मांगी जाना।
  • आम मोबाइल नंबर या विदेशी नंबर से कॉल, जबकि सरकारी दफ़्तर STD कोड वाली लैंडलाइन से बात करते हैं।

नकली बैंक अधिकारी और KYC वाली कॉल

यही मनोविज्ञान छोटे रूप में हर दिन बैंक के नाम पर दोहराया जाता है: "आपका खाता आज रात बंद हो जाएगा, KYC अपडेट कर लीजिए", "आपके कार्ड पर संदिग्ध ट्रांज़ैक्शन हुआ है, रोकने के लिए OTP बताइए", "रिवॉर्ड पॉइंट ख़त्म हो रहे हैं, यह ऐप इंस्टॉल कीजिए"। तीनों में असली मक़सद एक ही है: OTP लेना या स्क्रीन शेयर वाली ऐप इंस्टॉल करवाना। याद रखिए कि कोई भी बैंक कर्मचारी OTP, PIN, CVV या पासवर्ड नहीं पूछता, और न ही किसी को कोई ऐप इंस्टॉल करवाता है। कॉल काटिए और बैंक का नंबर उसकी अपनी ऐप या अपने कार्ड के पीछे से देखकर ख़ुद डायल कीजिए। यह भी ध्यान रखिए कि टेलीमार्केटिंग के लिए 140 सीरीज़ तय है, इसलिए आम मोबाइल नंबर से आया कोई भी "बैंक अधिकारी" पहले ही संदिग्ध है।

परिवार को कैसे बचाएं

यह बातचीत घर में पहले से कर लीजिए, ख़ासकर बुज़ुर्ग माता-पिता और अकेले रहने वाले सदस्यों के साथ, क्योंकि इस फ़्रॉड का शिकार ज़्यादातर वही होते हैं जो अकेले होते हैं। एक साफ़ पारिवारिक नियम तय कीजिए: कोई भी कॉल पैसे या OTP मांगे तो फ़ोन काटकर पहले घर के किसी सदस्य को कॉल करना है, चाहे सामने वाला कुछ भी कह रहा हो। घर में सबको यह एक वाक्य याद रहना चाहिए कि डिजिटल अरेस्ट होता ही नहीं। किसी घटना के बाद: पैसे भेज दिए हों तो सबसे पहले बैंक को कॉल कीजिए, फिर 1930 पर शिकायत दर्ज कीजिए और cybercrime.gov.in पर ट्रांज़ैक्शन आईडी, नंबर और स्क्रीनशॉट के साथ पूरी जानकारी दीजिए। कॉल की रिकॉर्डिंग और चैट संभालकर रखिए। और किसी को शर्मिंदा मत कीजिए: यह फ़्रॉड कॉल सेंटर की तरह चलाया जाता है और इसमें डॉक्टर, प्रोफ़ेसर और रिटायर्ड अधिकारी तक फंस चुके हैं। दूसरे आम पैटर्न नकली डिलीवरी SMS में देखिए।

वे क्या कहते हैंक्यों शक करेंकैसे जाँचें
सीबीआई, पुलिस या कस्टम बतानाकोई एजेंसी वीडियो कॉल पर गिरफ़्तार नहीं करतीकाट दें और 1930 पर बताएँ
आपके नाम का पार्सल पकड़ा गयाडर से सोचने की क्षमता दबाई जाती हैघर में किसी को तुरंत बताएँ
वीडियो कॉल पर बने रहने को कहनाताकि आप किसी से पूछ न सकेंकॉल काट दें
पैसा सत्यापन के लिए भेजने को कहनाऐसी कोई सरकारी प्रक्रिया नहीं हैकुछ भी ट्रांसफ़र न करें
वर्दी और नक़ली दफ़्तर दिखानाभरोसा जमाने का दिखावादिखने वाली चीज़ प्रमाण नहीं होती
क्या कहा जाता है और कैसे जाँचें

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या भारत में "डिजिटल अरेस्ट" जैसी कोई क़ानूनी चीज़ है?

नहीं। किसी भी भारतीय क़ानून में यह शब्द मौजूद नहीं है। पुलिस या किसी जांच एजेंसी की असली कार्रवाई लिखित नोटिस, थाने और अदालत के ज़रिए होती है, वीडियो कॉल पर नहीं। कोई भी कॉल जिसमें यह शब्द आए, फ़्रॉड है।

अगर कॉल पर CBI या पुलिस का अधिकारी होने का दावा किया जाए तो क्या करूं?

कॉल काट दीजिए और घर के किसी सदस्य को बताइए। कोई पैसा मत भेजिए, आधार, PAN या OTP मत बताइए। ज़रूरत लगे तो अपने नज़दीकी थाने का नंबर ख़ुद ढूंढ़कर कॉल कीजिए और 1930 पर शिकायत दर्ज कीजिए।

क्या बैंक कभी OTP मांगता है?

कभी नहीं। न बैंक, न RBI, न कोई सरकारी विभाग OTP, PIN, CVV या पासवर्ड मांगता है। कोई भी कॉल जिसमें ये मांगे जाएं, ठगी है, चाहे स्क्रीन पर बैंक का नाम या नंबर ही क्यों न दिख रहा हो।

क्या नंबर जांचने से यह फ़्रॉड पकड़ा जा सकता है?

यह एक मज़बूत संकेत देता है: ऐसी कॉल के पीछे आमतौर पर नई, निशान-रहित VoIP लाइन या विदेशी नंबर होता है, जबकि असली सरकारी दफ़्तर STD कोड वाली लैंडलाइन से बात करते हैं। नतीजे संभावित मिलान होते हैं, इसलिए असली बचाव नियम ही है: कॉल काटिए, किसी को बताइए, पैसे मत भेजिए।

मिलते-जुलते गाइड

पता लगाइए कि नंबर के पीछे असल में कौन है

एक निजी जांच में लगभग 60 सेकंड लगते हैं। जिस व्यक्ति का नंबर आप जांच रहे हैं, उसे कोई सूचना नहीं जाती।

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